BLOG DESIGNED BYअरुन शर्मा 'अनन्त'

सोमवार, 26 अगस्त 2013

बंशी की धुन



मनमोहना 
छेड़ बंशी की धुन 
मिटे ना तृष्णा 

कृष्ण कन्हैया 
देखा तेरा मुखड़ा 

हुआ सबेरा 

माखन चोर 
मटकी भयि  ऊँची 
थाम ले बांह 


छलक रही 
पाप भरी गगरी 
तोड़ो हे हरी


देख अधर्म 

बैरन  बंसुरिया 
क्यूँ है तू  मौन  …।!!


बाजी  न हारी 
फिर भी लुट रही 

आज की नारी 


लुटती नार 
भूले दौपदी सखा 
वादा क्यूँ आज  ….???