लगाये झड़ी
रिमझिम सावन
अँखियाँ बूढी
बादल दिखे
हरियाली सपने
आँखों में चीखे
लौटा सावन
लौटेंगी बहारे भी
उम्मीदें हरी
सावन मास
तांडव नृत्य कहीं
रचता रास
सावनी घटा
बेशकीमती रत्न
वृथा न लुटा
श्रावणी मेले
याद आये बाबुल
गोदी के झूले
मनाती तीज
चुनड हरी ओढ़े
रूपसी मही
हुयी जवान
नदिया बरसाती
हदें तोड़ती
सावनी घटा
ठहर कुछ पल
राहो में पिया
फिर बरसी
वादों की बदरिया
जनता प्यासी
वादों के मेघ
बरसे रुक रुक
भीगे है देश
भूखी जनता
वादों की रोटी सेंके
देश के नेता
कल का वादा
बीत गए बरसों
आज भी ताजा


