BLOG DESIGNED BYअरुन शर्मा 'अनन्त'

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

ज्योति पर्व है



ज्योति पर्व है 
जले प्रीत के दीप 
यही मर्म है 


जले जो दीप
दया धर्म प्रीत का
मिटे तमस

नभ प्रांगण
तारक दीपमाला
 चन्द्र कंदील

ज्ञान के दीप
अमूल्य है पुस्तकें
रद्दी न तोले

राह दिखाते
टिमटिमाते दीप
जुगनू  नन्हे

कोई आया है
अँधेरी बस्तियों में
दीप लाया है


जलाये दीप 
अन्धो की बस्तियों में 
रहा अँधेरा 


दीप कहता
जब तक है श्वाँस
योद्धा विजेता

दीप सन्देश
आखरी दम तक
छोडो न आस

बेचो  कबाड़
ज्ञानदीप किताब
करना दान

लक्ष्मी की आस
 द्युतरत  झुग्गियाँ
दीप उदास

रंग रोगन
चमक उठे घर
दीमक लगे

देखे झोपड़
महलों के सपने

खेले चौपड़

मावस रात्रि 
एक दीप जला  दो 
थमे न राही 

देता पहरा 
उम्मीदों का दीपक 
मन देहरी 

प्रतीक्षा रत 
देहरी पर दीप 
सांझप्रहर 

अपने दूर 
बेरंग लगे होली 
उदास दीये 


विद्युत लड़ी
सजाती है कोठियाँ

झुग्गी को दीया


दिल से दिल
मिले दीप से दीप
हँसे उजाले


सोमवार, 22 सितंबर 2014

कोई न सगा



बोंजाई बने 
बरगद से रिश्ते 
सिमटी छाया 

आँधी  थी भली 
साथ उड़ा  ले गई 
रिश्ते नकली 

 रोती  गुड़िया
किताबो में खो गयी    
नन्हीं परियां      

जीवित रिश्ते 
लड़ते झगड़ते 
मुर्दा न बोले 

उधडे रिश्ते 
जतन से सिलती 
जोड़ दिखते 

धूप प्रखर 
लम्बी परछाईंयां 
दुबकी  घर 


कोई न सगा
साये भी देते दगा
दिन ढलते 





सोमवार, 18 अगस्त 2014

श्री कृष्ण अवतार


श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई  

अधर्म नाश 
श्री कृष्ण अवतार 
दिव्य प्रकाश 

चाह वात्सल
त्रैलोक्य स्वामी कान्हा
बंधे ओखल

भरा है घड़ा
कलि कंसो के पाप
फोड़ो कन्हैया

बंशी बैरन
कृष्ण अधर सजी 
राधिका जली 

राधे गोविन्द
दो तन एक प्राण
अमर प्रेम

कान्हा अधीर
पनघट है सूना
एक सी पीड़

मन कालिंदी
कालिया माया तृष्णा
काढ़ते फन

मन मोहन
बाँसुरी बना मुझे
छेड़ दूँ तान

घने अँधेरे
ज्योतिपुञ्ज हो तुम
मेरे साँवरे

मुख में तेरे
त्रैलोक्य समाहित
तू मन मेरे 

बसे है मन
चितचोर नयन
ले गये चैन

राधा न मीरा 
समर्पित गोपिका 
कृष्ण शरण

शाश्वत प्रेम 
राधे गोविन्द छवि 
शेष है काम

राधा लजाई 
डगर पनघट 
कृष्ण कन्हाई

नाग नथैया 
मन कालिंदी पैठो 
हत कालिया

तुम हो साथ 
मिटे मन विकार 
बढ़ाना हाथ

मेरे मोहन 
चिर काल विराजो 
मन मंदिर

मनमोहन 
आन बसो मन में 
धन्य जीवन

सहस्त्र नाम 
विराट रूप प्रभू 
दया के धाम

नाम हजार 
विविध रूप ,कर्म 
रिपु संहार

नाच्यो बहुत 
धर हाथ मुरारी 
अनंत सुख